नफरत और हिंसा के खिलाफ इप्टा की “ढाई आखर प्रेम की ” सांस्कृतिक यात्रा का जगह-जगह हुआ भव्य स्वागत

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अनिल शर्मा + संजय श्रीवास्तव

उरई | आजादी के 75 वर्ष मैं नफरत और हिंसा देश में चल रहे वातावरण के खिलाफ प्रेम और भाईचारा से जोड़ने के लिए भारतीय जन नाट्य संघ” इप्टा” के सहयोगी संगठन पॗलेश, जलेश,जसम , दलित लेखक संघ के संयुक्त तत्वाधान में बीती 9 अप्रैल 2022 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से भारतीय जन नाट्य संघ के राष्ट्रीय महासचिव राकेश के नेतृत्व में 25 इप्टा रंगकर्मियो के साथ यह सांस्कृतिक यात्रा ढाई आखर प्रेम के शुरू हुई|| 9 अप्रैल वर्ष 1936 को महान साहित्यकार प्रेमचंद और प्रसिद्ध शायर सज्जाद जहीर के नेतृत्व में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई थी| जैसे महान साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन यशपाल जी ने आगे बढ़ाया इसी तरह वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और बंगाल के अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए देशभर के कलाकार एकजुट हुए नबान्न नाटक केबसाथ इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा शुरू हुई| आजादी के 75 वर्षों मेंइप्टा और सहयोगी संगठनों की यह सांस्कृतिक यात्रा देश में नई आशा नई उम्मीद के साथ देश के लोगों को जीवन के मूल तत्व प्रेम से जोड़ने के लिए शुरू हुई है जो आगामी 22 मई को मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में समाप्त होगी | भारतीय जन नाट्य संघ के राष्ट्रीय महासचिव राकेश जी ने बताया की सांस्कृतिक यात्रा के दौरान जिले कस्बा गांव जहां भी 18 57 के क्रांतिकारी शहीदों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों समाज सुधार को भक्ति आंदोलन और सूफीवाद के पुरोधा लेखकों रंग कर्मियों कलाकारों के घर आंगन की पवित्र मिट्टी लेकर पंजाब में शहीद-ए-आजम भगत सिंह के गांव पुणे इस इकट्ठा की गई पवित्र मिट्टी को ले जाकर वहां पौधारोपण किए जाएंगे जो लोगों के भीतर असली भारत बनाने के लिए शहीदों की क्या इच्छा थी तथा वे यस भाईचारा और प्रेम को देश में मजबूत करना चाहते थे उसका यह संदेश यह वृक्ष देशवासियों को संदेश देते रहेंगे बहराल जैसे ही यात्रा आज सुबह हो रही पहुंची सबसे पहले पटेल चौक में महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया इसके पूर्व इस सांस्कृतिक यात्रा का उरई वासियों द्वारा भव्य स्वागत किया गया इसके बाद पटेल चौराहे से ही सांस्कृतिक मार्च प्रारंभ हुआ जो भारत रत्न बाबासाहेब डॉक्टर अंबेडकर के पार्क पर पहुंचा और प्रतिमा पर माल्यार्पण किया इसके बाद यह सांस्कृतिक मार्च शहर की बजरिया में पहुंचा जहां स्थान स्थान पर फूल बरसा कर शरबत पिला कर स्वागत किया गया इसके बाद यह यात्रा माहिल तालाब पर पहुंची इस दौरान रास्ते भर सांस्कृतिक यात्रा में चल रहे लोगों पर पुष्प वर्षा होती रही माहिल तालाब पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया इसके बाद यह यात्रा शहीदे आजम भगत सिंह पार्क पर पहुंची जहां यात्रा के साथ अतिथियों ने शहीदे आजम भगत सिंह सुखदेव राजगुरु की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण किया तथा जंनगीत गाऐ | इस अवसर पर सुनीता सुमन संस्थान के नन्हे-मुन्ने बाल कलाकारों ने एक नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किया जिसे बहुत सराहा गया इसके बाद यह यात्रा शहीदे आजम भगत सिंह चौराहा पहुंची जहां शहीदे आजम की प्रतिमा का माल्यार्पण किया गया इसके बाद यह सांस्कृतिक मार्ग नगर के गांधी चबूतरा स्थित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा पर पहुंचा जहां माल्यार्पण किया गया इसके बाद उरई नगर की इस यात्रा का यहां समापन हो गया| इसके बाद भी है यात्रा हरदोई गुर्जर कोच और जालौन के लिए रवाना हो गई जहां जालौन में यह यात्रा रात्रि विश्राम करेगी वहीं पर कवि गोष्ठी भी होगी। इस सांस्कृतिक मार्च में इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश , दिलीप रघुवंशी साहित्यकार यज्ञ दत्त त्रिपाठी रंगकर्मी बीके सोनकिया डॉ सतीश शर्मा प्रसिद्ध अंबेडकरवादी चिंतक बाबू रामाधीन शिक्षक नेता गिरेन्द्र सिंह, सुधीर अवस्थी कार्यक्रम आयोजक रंगकर्मी देवेंद्र शुक्ला, राज्य पप्पन, वरिष्ठ पत्रकार के पी सिंह, समाजसेवी सुदामा दीक्षित, डॉक्टर अंकुर शुक्ला, रेहान सिद्दीकी, डॉ राकेश द्विवेदी, प्रसिद्ध गायक मिर्जा साबिर, शायर शफीकुर्हमान कश्फी, रंगकर्मी दीपेंद्र, संजीव, सहित तमाम रंगकर्मी बड़ी संख्या में मौजूद थे.

14 मई 1858 में 19 लोगों को एक ही दिन फांसी पर लटका दिया गया
जत्था पहुंचा ऐतिहासिक गांव ‘हरदोई गूजर’
प्रेम का संदेश देते हुए, इप्टा की यह यात्रा भारत के इतिहास से परिचित होते हुए आगे बढ़ रही है। वह इतिहास जो गांवों में दफन हो गया, जो इतिहास लिखने वाले के पूर्वाग्रह का शिकार हो गया और राजनीति तो है ही।
उरई के हरदोई गूजर गांव की गढ़ी में 9 मई 1858 को अंग्रेजों द्वारा एक ही दिन में 19 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था।
इसके पीछे की कहानी यह है कि 1857 में इस गढ़ी के राजा ने वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के दस्ते को शरण दी थी। कहते हैं रानी यहां पर अपने सिपाहियों के साथ सिर्फ 3 घंटे के लिए रुकी थी।
बाद में अंग्रेज सरकार को पता चला और 1858 में पूरी गढ़ी को तहस-नहस कर एक ही परिवार के 8 सदस्यों सहित कुल 19 लोगों को फांसी दी गई थी।
यह कहानी भी गांव के कम ही लोगों को पता है और जिनको पता है तो कोई कहता है कि बुंदेलों की गढ़ी थी, कोई कहता है गुर्जरों की गढ़ी थी।
खैर किसी की भी गढ़ी हो इप्टा इन बलिदानियों की शहादत को नमन करती है कि अंजाम जानते हुए भी इस गढ़ी के राजा ने अंग्रेजों के खिलाफ रानी का साथ दिया था।
इस जगह की मिट्टी पात्र में रखी गई
हरदोई गूजर गांव में जनगीत गाते हुए जत्था किसान वीर सिंह यादव के मकान पहुंचा। यहां घर के बाहर पाखर के पेड़ के नीचे जनगीतों, नाटकों की प्रस्तुति दी गई।
आगरा इप्टा के साथी संजय सिंह, कमल गोस्वामी, जय कुमार, असलम खान आदि साथियों ने आगरा इप्टा के महासचिव दिलीप रघुवंशी के नेतृत्व में ‘मंहगाई डायन खाए जात है’ गीत नाटकीय अंदाज में और काव्यात्मक अंदाज में शहादत नाटक की प्रस्तुति दी।
लखनऊ लिटिल इप्टा के साथियों ने सुमन श्रीवास्तव के निर्देशन में मुंशी प्रेमचंद की कहानी मंदिर का नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया।
घोर गर्मी में पाखर की घनी छांव के नीचे शीतलता के अनुभव को व्यक्त करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश वेदा ने कहा कि यह पेड़ अनुकूल वातावरण का काम कर रहा है, ठंडक प्रदान कर रहा है और कुछ लोग इन पेड़ों को काट रहे हैैं। वह वातावरण की शीतलता को खत्म कर रहे हैं न सिर्फ प्राकृतिक बल्कि सामाजिक वातावरण को भी नफ़रत से भर देना चाहते हैं।

हमें पेड़ की भी रक्षा करनी है और समाज की भी ताकि वातावरण में शीतलता बनी रहे। इप्टा हरे भरे पेड़ की तरह ही इस गर्म माहौल में प्रेम और सद्भाव का संदेश लेकर निकली है। कार्यक्रम के सहयोगियों को उरई इप्टा की तरफ से राकेश जी के हाथों प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

भरी दोपहर में सैकड़ों ग्रामीण उपस्थित रहे। पाखर की घनी छाया ने दोपहर का अहसास ही नहीं होने दिया और पेड़ की छांव से बाहर आते ही लू और लपट का अहसास सुखद तो नहीं रहा।
गांव में पेड़े और समोसे के साथ ही शर्बत पिलाकर स्वागत किया गया।
-जत्था कोंच तहसील के लिए रवाना हो चुका है।
संजय श्रीवास्तव- समूह सम्पादक (9415055318)
शिविलिया पब्लिकेशन- लखनऊ,
अनिल शर्मा- निदेशक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम

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