साझे वाले घर पर बेटी, बहू, सास, मां, पत्नी के हक में सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला

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यंग भारत ब्यूरो
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के हितों की रक्षा करने को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत ‘साझे घर में रहने के अधिकार’ की व्यापक व्याख्या की। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिला, चाहे वह मां, बेटी, बहन, पत्नी, सास, बहू या घरेलू संबंधों में हो उसे साझे घर में रहने का अधिकार है। शीर्ष अदालत ने घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम (Domestic Violence Act) के तहत ‘साझा परिवार’ प्रावधान का विश्लेषण करते हुए 79 पेज का फैसला सुनाया।

महिला को साझे घर में रहने का अधिकार
जस्टिस एम आर शाह और जस्टिस बी वी नागरत्ना की बेंच पति की मौत के बाद घरेलू हिंसा से पीड़ित एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। बेंच ने कहा कि एक महिला जो घरेलू संबंध में है, उसे साझा घर में रहने का अधिकार है। भले ही वह पीड़ित नहीं है या घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत केस नहीं है। इस प्रकार, एक घरेलू रिश्ते में एक मां, बेटी, बहन, पत्नी, सास और बहू या महिलाओं की ऐसी अन्य कैटेगरी में महिलाओं को साझा घर में रहने का अधिकार है। शीर्ष अदालत ने कहा कि इसे केवल वास्तविक वैवाहिक आवास तक ही सीमित नहीं किया जा सकता है, बल्कि संपत्ति पर अधिकार के बावजूद अन्य घरों तक बढ़ाया जा सकता है।

साझे घर से बेदखल या बाहर नहीं कर सकते
इस दौरान बेंच ने भारतीय महिलाओं की उस अजीब स्थिति से निपटने की कोशिश की जो वैवाहिक आवासों से अलग जगहों पर रहती हैं, जैसे कि उनके पति का कार्यस्थल आदि। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि अनेक प्रकार की स्थितियां एवं परिस्थितियां हो सकती हैं और प्रत्येक महिला साझे वाले घर में रहने के अपने अधिकार का प्रयोग कर सकती है। फैसले में जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि महिलाओं की उपरोक्त श्रेणियों और घरेलू संबंधों में महिलाओं की ऐसी अन्य श्रेणियों के निवास के अधिकार की धारा 17 की उप-धारा (1) के तहत गारंटी है। इस तरह से उन्हें साझे घर से बेदखल या बाहर नहीं किया जा सकता है। घरेलू हिंसा के किसी भी रूप के न होने पर भी एक घर में रह सकते हैं।
अधिकतर महिलाएं ना तो शिक्षित ना ही कमा रही हैं
बेंच ने कहा कि भारतीय सामाजिक संदर्भ में, एक महिला के साझा घर में रहने का अधिकार का अद्वितीय महत्व है। इसकी वजह है कि भारत में, ज्यादातर महिलाएं शिक्षित नहीं हैं और न ही वे कमा रही हैं। इसके अलावा न ही उनके पास अकेले रहने के लिए स्वतंत्र रूप से खर्च करने के लिए पैसे हैं। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि वह न केवल इमोशन सपोर्ट के लिए बल्कि उपरोक्त कारणों से घरेलू रिश्ते में रहने के लिए निर्भर हो सकती है। भारत में अधिकांश महिलाओं के पास स्वतंत्र आय या वित्तीय क्षमता नहीं है। वे अपने घर पर पूरी तरह से निर्भर हैं।

साझा घर में रहने का अधिकार वास्तविक घर तक सीमित नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम नागरिक संहिता का एक हिस्सा है जो प्रत्येक पर लागू होता है। संविधान के तहत गारंटीकृत अपने अधिकारों की अधिक प्रभावी सुरक्षा के लिए और घरेलू संबंधों में होने वाली घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए भारत में महिला, चाहे उसकी धार्मिक संबद्धता और/या सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो। जस्टिस शाह और नागरत्ना ने कहा कि ‘साझा घर में रहने का अधिकार’ वास्तविक निवास तक सीमित नहीं हो सकती है। दूसरे शब्दों में, साझा घर में वास्तविक निवास की अनुपस्थिति में भी, महिला उसमें रहने के अपने अधिकार को लागू कर सकती है।
शादी के बाद पति के घर में रहने का अधिकार
वास्तविक निवास के संबंध में उदाहरण देते हुए पीठ ने कहा कि अगर एक महिला की शादी हो जाती है तो उसे अपने पति के घर में रहने का अधिकार मिल जाता है जो कि घरेलू हिंसा एक्ट के तहत एक साझा घर बन जाता है। भारत में, यह है एक महिला के लिए एक सामाजिक मानदंड, उसकी शादी पर उसके पति के साथ रहने के लिए, जब तक कि पेशेवर, व्यावसायिक या नौकरी की प्रतिबद्धताओं के कारण, या अन्य वास्तविक कारणों से, पति और पत्नी अलग-अलग स्थानों पर रहने का फैसला करते हैं। इसके बावजूद ऐसे मामले में भी उसे एक साझा घर में रहने का अधिकार है।
संजय श्रीवास्तव- समूह सम्पादक (9415055318)
शिविलिया पब्लिकेशन- लखनऊ,
अनिल शर्मा- निदेशक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम

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